थी रवा उस राह पर जहां हर मोड पे पत्थर थे,
वक़्त सख्त था, गिरती संभलती रही,
सबक लेती रही
ना अपनों ने साथ दिया
ना चार लोग चुप थे,
कुछ कर दिखाना था,
खुद से खुद को मिलवाना था,
खुदा साथ देता रहा, बंद थे जो दरवाजे खुलते गए
माज़ी पीछे छूट गया, आज खुद से हूं, जो हूं मैं हूं।
Sofiya
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