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Showing posts from April, 2026
  कहना था बहुत कुछ पर चुप रही शोर था अंदर, तूफ़ान था जो सब फ़ना कर देता थेहरा कैसे? गम के काले बादल फटने लगे, सैलाब सा बहता गया आँखों से दर्द जो था वो मुस्कान के पीछे छुपा था बाहर से लगता सब खुबसूरत है, मंज़र तो अंदर था जो सहना सके कहना था बहुत कुछ पर चुप रही Sofiya
  अगर हम पहले मिले होते, कैसा होता? क्या हम आज जैसे हैं वैसे ही होते? हम साथ चलते, साथ बैठते? क्या हँसते और बातें करते? शायद ऐसे ना होते जो आज है तब वक़्त को मंजूर ना था जो अब होना था आंसुओं का बहना था, दर्द को महसूस करना था, मिलने से पहले संभलना भी जरूरी था अगर हम पहले मिले होते, कैसा होता? Sofiya
  तुझ से बात होती है तो सारे गम भूल जाती हूं इस भरी दुनिया में एक तू ही है जिससे बात करने को दिल चाहता है मुशरूफ़ लम्हों में तेरे थोड़े से वक़्त का इंतज़ार रहता है दिल करता है तेरे पास आ कर बैठू तेरी हर बात को सुनु जो किसी से ना कही हो तेरी आँखों में खुद को देखु एक सुकून सा लगता है जब तुझ से बात होती है Sofiya
  बात वक़्त मिलने की नहीं है, अहमियत कितनी है? बात सही है या गलत होने की नहीं है, साथ कितना है? मशरूफ़ रह कर भी दो पल बात हो सकती है, हाले दिल पूछते और बताते, फुरसत में तो हर कोई पास आता है, काश हम भी किसी के अपने होते, हमारे लिए भी मोहब्बत के लम्हे उन मशरूफ़ पलों में होते, ये ना कहते कल बात करते हैं अगर वक्त मिला तो बात वक़्त मिलने की नहीं, अहमियत कितनी है? Sofiya
कभी कभी सोचती हूँ तुम हो, काफ़ी है मेरे दिल के सुकून के लिए, जब ख्याल आता है के तुम पास नहीं हो, काफ़ी है मेरी आँखो की नामी के लिए, हवा का झोंका जब छू जाये, काफ़ी है के तुम हो यहीं कहीं एहसास तुम्हारे होने का, काफी है मेरे जीने के लिए। Sofiya
  ये कोई इत्तेफाक तो नहीं, खुदा की ही मर्जी है, किसी बहाने से मिलवाया तो है, शायद मेरी ख्वाहिश थी कोई एहसास की, मशरफ़ हो कर भी, वक़्त की पाबन्दी है, मिलो की दूरी है, फ़िर भी मुझे महसूस करवा देता है मोहब्बत की सीमा नहीं है, बस रूह का रूह से मिलना है ये कोई इत्तेफाक तो नहीं Sofiya