बात वक़्त मिलने की नहीं है,
अहमियत कितनी है?
बात सही है या गलत होने की नहीं है, साथ कितना है?
मशरूफ़ रह कर भी दो पल बात हो सकती है,
हाले दिल पूछते और बताते,
फुरसत में तो हर कोई पास आता है, काश हम भी किसी के अपने होते,
हमारे लिए भी मोहब्बत के लम्हे उन मशरूफ़ पलों में होते,
ये ना कहते कल बात करते हैं अगर वक्त मिला तो
बात वक़्त मिलने की नहीं, अहमियत कितनी है?
Sofiya
Comments
Post a Comment