दिन में तुम याद आते हो
मशरूफ कर देते हैं खुद को हम
वक़्त और हालात की ज़ंजीरों में बंधे हैं पर ये शाम धीरे-धीरे सारे बंधन तोड़ने लगती है वापस तुम्हारी ओर खींचे तुम कहीं नज़र ना आए ये रात का सन्नाटा अकेलापन सताए ,
दिल घबराए मानो जैसे रुकते-रुकते सांसें आए
आँखों से आँसू बहते जाए
तुम्हारी याद जो आएSofiya
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